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Thursday, March 24, 2016

Kapoor & Sons * * *

My Rating : 3/5

Okay, this feels great. Writing a Movie review after ages courtesy the coerced living on a hill. Errr minor correction, Queen of Hills. Kapoor and sons, the title is a bit vague and doesn’t give you much about the film and the trailer gives an impression that it’s just another situational comedy about a screwed up family. This again reaffirms our faith in the idea that don’t go with reviews or trailers. Err….the last line just sent me to an existential crisis that should I continue writing this review?


Anyway since I already started,  the movie is a sweet little surprise. A simple family drama shot in the beautiful locations of Coonoor can be such intense, I had no idea. It’s basically a soothing portrayal of various relationships in a family. Between father and sons, mother and sons, father and mother, grandfather and others and more importantly father and mistress. Looking at the family picture, one would have no idea about how complicated things can be. This is a wonderful attempt to convey this very idea.


Another aspect is that how simple biases and prejudices can blow up the whole family fabric via the butterfly effect. A mother has two sons- the good and the different. The bias for the former can be so so destructive for the later. And in that belief we tend to do things which can change everything.  All this equations have been coupled with extraordinary performances from almost all the actors and especially by Rishi Kapoor and Ratna Pathak.


Rishi Kapoor as the grandfather has been terrific. All the laughter in the film revolves around him. And it’s totally amusing to see that it is because of him that the entire family comes together. In this age of nuclear family, it is perhaps only the grand generation which can pull off this wonder. The movie grows slowly in terms of intensity as more and more secrets unfold and the unspoken is spread out.



No doubt it is one of the best family dramas in recent times. Of course not something worthy of making it to the top brass but certainly a good family outing to explore the intermingling of emotions and relationships packed with wonderful performances. And how can I forget that mandakini cut out, I want one for myself!

Thursday, August 7, 2014

CSAT क्यों ज़रूरी है ?

यह जीवन कई चक्रों से भरा हुआ है | एक छोर से शुरुवात होती है और दुसरे पर उसका अंत और अगर अंत तक हमे अपने लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं होती तो हम फिर से उसी चक्र में वापिस सम्मिलित हो जाते है | एक बार फिर हम निकल पड़ते है उसी राह पर एक नए विश्वास से, एक नए हौसले के साथ |

UPSC की सिविल सर्विस परीक्षा भी कुछ लोगो के लिए जीवन के इन चक्रों के सामान है और यह सबसे मुश्किल और थका देने वाले चक्रों में से एक है | एक कड़ा इन्तेहाँ है यह सब्र का, धैर्य का और कर्म निष्ठता का | हर वर्ष के तरह इस बार भी विद्यार्थी जोर शोर से अपनी अपनी तैयारियों में लगे हुए है | पर इस बार UPSC के समक्ष कई सवाल रखे गए है | वर्ष २०११ में लायी गयी CSAT परीक्षा से काफी लोग असंतुष्ट है और उनकी ये मांग है के इसे निरस्त किया जाए | इन्ही सब के चलते एक असमंजस सा है की यह परीक्षा समय पर होगी की नहीं और ऐसे में भला कोई मन लगा के पढ़े तो कैसे, बताइए ज़रा!

वर्ष २०११ के पहले जब CSAT नहीं था तब ये देखा गया था के सिविल सर्विस में चयनित हुए विद्यार्थी, जो अपना प्रशिक्षण कर रहे थे, उनमे से कई लोगो को अंग्रेजी भाषा और डाटा व्याख्या में परेशानियां हो रही थी | और इसी के चलते CSAT परीक्षा के कल्पना की गयी थी | इसे और अच्छे से समझने के लिए हमे एक सरकारी अफसर के कार्य को गहरायी से देखना होगा | सबसे पहले हम आते है भाशा के इस विवादस्पद पहलु की तरफ | देखिये इसमें तो कोई भी दो राय नहीं है की हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है और इसे उच्च दर्जे का सम्मान मिलना ही चाहिए | परन्तु इस बात को भी आप झुटला नहीं सकते है की आज कल देशो की सरहदे सिर्फ कागजी है और हम एक दूसरे के सहयोग पर निर्भर है | आपसी ताल मेल के लिए हमे एक अंतर राष्ट्रीय भाषा की भी जरुरत है और अंग्रेजी भाषा इस सन्दर्भ में उचित प्रतीत होती है | जब आम लोगो के लिए ही यह दोनों भाषाए इनती ज़रूरी हो गयी है तो सोचिये की अगर हमारे अफसर इन्हें नहीं जानेंगे तो उनके कार्य पर बुरा असर तो ज़रूर ही पड़ेगा | तो यहाँ पर यह कहना उचित होगा की दोनों ही भाषाओ का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है |

अब हम आते है चल रहे विवाद के दुसरे पहलु पर, जो की गणित और डाटा व्याख्या के सवालो से सम्बंधित है | सवाल यह है की क्या यह योग्यता ज़रूरी है ? लगभग पिछले एक साल से मैं भारत तिब्बत सीमा बल में एक सहायक सेनानी के रूप में कार्यरत हूँ | अपने कार्य को करते हुए और दुसरे अफसरों के साथ कार्य कर मैं यह पुरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ की इस योग्यता का बड़ा ही महत्व होता है | एक अफसर का मुख्य कार्य फैसले लेने का होता है और इन फैसलों पर बहुत सारे लोगो का भविष्य निर्भर करता है | तो अगर एक अफसर में तथ्यों और हालातो को समझने और फिर सही निष्कर्ष निकालने की शमता नहीं होगी तो फिर यह किसी के लिए भी अच्छा नहीं है | और कई वैज्ञानिक अध्यन इस बात की पुष्टि करते है की इस तरह के सवालों के द्वारा हम लोगो की इस योग्यता को परख सकते है |

एक और पहलु यह है की CSAT की परीक्षा में क्या अंग्रेजी भाषा को परखना जरुरी है ? सिविल सर्विस की मुख्य परीक्षा में पहले ही दो अनिवार्य पेपर है जो की हिंदी और अंग्रेजी से सम्बंधित है | तो फिर दो दो बार इसको लाना उचित नहीं है | CSAT परीक्षा को केवल आकांशी की डाटा व्याख्या योग्यता और फैसला लेने की शमता को ही आकना चाहिए | और रहा सवाल गद्यों पर आधारित प्रश्नों को तो फिर अंग्रेजी और हिंदी के सामान प्रश्न इसमें सम्मिलित किये जा सकते है | यह मेरी स्वयं की सोच है और दूसरो को पूरा अधिकार है की वो अपने अलग विचार रखे और प्रस्तुत करे |

रही बात दूसरी भाषाओ की, तो सबसे पहले मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की सभी भाषाओ का अपना महत्व है और भारत की विविधता इसी बात से है की यहाँ विभिन्न भाषाए और संस्कृतियाँ है | राज्य स्तर पर इन भाषाओ के संरक्षण के सारे प्रयास किये जाने चाहिए | परन्तु यह समझना भी ज़रूरी है की हमारी राष्ट्रीय भाषा भी उतनी ही ज़रूरी है और सभी नागरिको को हिंदी को प्रयोग आना चाहिए | और जहा तक प्रश्न पत्र को सभी भाषाओ में छापने का सवाल है तो ऐसे बहुत कम ही लोग होंगे जो इसकी मांग करेंगे क्यूंकि हिंदी या अंग्रेजी में उनके एक भाषा तो आती ही होगी | एक अफसर से इनती मूल अपेक्षा तो की ही जा सकती है | कुछ लोग यह तर्क देते है की उन्हें बाद में यह सब सिखाया जा सकता है | परन्तु अगर सब बाद में ही सिखाना है तो परीक्षा लेने का क्या तर्क है | सीधी सा उदहारण है की बच्चा दूसरी कक्षा में तो तभी जायेगा ना जब वो पहली कक्षा उत्तीर्ण करेगा | इसी तरह अफसरशाही में आने की भी कुछ मूल जरूरते है जो की इस परीक्षा द्वारा जाँची जाती है और अतः ये पूरी तरह से सही है |


प्रदर्शन कर रहे लोगो को पूरा अधिकार है अपना मत रखने का | पर अगर भविष्य के अफसर हिंसा का उपयोग कर रहे हैं तो यह बिलकुल भी अच्छा लक्षण नहीं है | अगर ऐसे लोगो के हाथ में हमारे देश का भविष्य है, तो भारत को क्या होगा, यह सोच कर ही डर लगता है | मोदी सरकार से यही आशा करता हूँ की कोई भी फैसला जल्दबाजी में राजनितिक कारणों से न लिया जाए | सभी पक्षों को सुनकर और तेज गति से बदतले विश्व को ध्यान में रखकर, सही फैसला लिया जाये | हिंदी के सही अनुवाद हेतु UPSC कोई विशेषज्ञ रख सकता है जिससे की एक समस्या का तो समाधान हो जायेगा | अंग्रेजी के केवल आठ सवाल अनिवार्य है जो की इतने सरल होते है की कोई दसवी का बच्चा भी आसानी से कर ले | मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है की लोगो को परेशानी अंग्रेजी से नहीं बल्कि गणित के सवालों से है | परन्तु इस बात पे तो प्रदर्शन नहीं किया जा सकता ना की प्रश्न बड़े कठिन है और अतः यहाँ अंग्रेजी की आड़ ली जा रही है | मेरी राय में तो किसी भी बदलाव की ज़रुरत नहीं है | पर मुझे विश्वास है की हमारी सरकार सभी पहलुओ के मधेनज़र सही फैसला लेगी |

Tuesday, July 29, 2014

वृक्षारोपण

वृक्ष और पेड़ पौधे किसे पसंद नहीं । जब भी हम अपने सीमेंट से बने शहरों से बहार निकल कर प्रकृति की गोद में आते है, तो एक  तीव्र सी तरंग  शरीर से हो गुजरती है और  हम अच्छा महसूस  है। जब भी हम हरियाली के आँचल में होते है, तो ऐसा लगता है की हम अपने असल घरौंदे में वापस आ गए है । यह ही हमारा अस्तित्व है और यहाँ पर ही हम पूर्ण महसूस करते है।

यह धरा सिर्फ मानवो की नहीं है। इसपर बाकि सारे जीव जंतु भी निर्भर है और यह संतुलन बना रहना ज़रूरी है ताकि सभी का अस्तित्व  रहे।  हम सब  एक दूसरे पर निर्भर है और जितना जल्दी हम इस बात को समझ ले उतना अच्छा । 

हाल ही मुझे इस प्रकृति को संतुलित  रखने में योगदान देने का अवसर मिला ।  भारत तिब्बत सीमा पोलिस (ITBP ) की वाहिनियों में हम विभिन्न दिवसों का आयोजन  करते है जिससे की जवानो का मनोबल बना रहता है और उन्हें ज्ञान का प्रदान भी होता है । इसी सन्दर्भ में हमने मानसून दिवस पर वृक्षारोपण करने का फैसला लिया । कई तरह के पौधे लाये गए और वाहिनी के सभी जवानो द्वारा उन्हें लगाया गया । 

Himveers planting trees

आज जब मैं उन पेड़ो को देखता हूँ तो अत्यन्त प्रसनता होती है ।  उनकी फ़िक्र भी होती है । कही वो सुख तो नहीं रहे है ? क्या उनको पूरा पोषण मिल रहा है ? जैसे की वह हमारी अपनी संतान हो। और जब गहरायी से इस बात को सोचेंगे तो पाएंगे की यह सौ आने सच है । वो हमारी  संतान है और हम उनकी । अन्त में मेरी आपसे यही विनती है की जब भी अवसर मिले तो पेड़ लगाये और अपना फ़र्ज़ निभाए । और जब कई सालो के पश्चात आप उन्हें एक छायादार या फलदार वृक्ष के रूप में देखेंगे, तो आपकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं होगा । 

Saturday, June 29, 2013

वो मासूम बारिश !

जाने कितने दिनों से,
तेरे लिए तरसा हूँ मैं ।
जाने कितने पलो में,
मैंने तुझे याद किया ,
और आज जाके जब,
तेरी इन छोटी छोटी बूंदों ने,
इन प्यारी मीठी बूंदों ने,
जब मेरा स्पर्श किया,
तो कही जाके इस दिल को चैन मिला ।

तेरे आने पे,
इस हवा में जो ताजगी हैं,
मौसम में जो मदहोशी हैं,
इन चेहरों पे जो मुस्कान हैं ,
वो अप्रतिम हैं ।

पर जाने क्यूँ, ये दिल उदास भी हैं ,
शायद तेरी ये  तेज हवाए ,
तेरी मगरूर अदाए ,
पानी से लतपत ये मैदान ,
मुझे याद दिलाते हैं, उन लोगो की ,
जो चले थे देव दर्शन पर, उन पहाड़ो में,
जिन्हें तूने अपने आलाप में ले लिया,
उन्हें उनके परिवारों से अलग कर।

मैं जानता हूँ दोष हमारा है,
हमने तू झे नकारा हैं,
स्वार्थी हो गए है हम सब,
पर सच तो यही हैं,
ये संसार कल भी तुम्हारा था ,
और आज भी तुम्हारा है।






Tuesday, September 25, 2012

ये ज़िन्दगी उसी की है


मुश्किलों से डरना कोई हल नहीं,
उनसे भागने वालो में दम नहीं।
निरंतर संघर्ष जो कर सके,
ये ज़िन्दगी उसी की है,
हर बार हो जो उठ खड़ा,
परवानगी उसी में है,
हार पे जो हस सके,
जीत भी उसी की है,
जीत बस उसी की है!

इस रफ़्तार भरी ज़िन्दगी में,
धैर्य का मूल्य समझ जाये जो,
बिना शर्तो के प्यार कर पाए जो,
डर को कुचल पाए जो,
ये ज़िन्दगी उसी की है।

आगे बढ़ने का जूनून हो जिसमे,
कुछ कर दिखाने की आग हो दिल म़ें,
मजबूत इरादे हो जिसके,
ये ज़िन्दगी उसी की है।

इसी ज़िन्दगी की तलाश, हमें भी है।
इसी आग की प्यास, तुम्हे भी है।






Wednesday, July 22, 2009

नन्हा सिपाही

बात उस समय की है जब हम नर्सरी स्कूल में पढ़ा करते थे। वो भी क्या दिन थे, न कोई फ़िक्र , न कोई आशाए और ना ही कोई अपेक्षाए। शायद वो ही एक ऐसा समय था जब हर जगह में सुन्दरता दिखती थी, हर चेहरा मुस्कुराता लगता था और हर अनजान शक्स अजीज दोस्त लगता था। उस समय हम इस कदर खुबसूरत लगा करते थे की हर कोई हमे अपनी बाहों में भर लेता था और हमारे कोमल गालो पे अत्याचार करता था।

मजे की बात तो ये थी की इस अत्याचार में लड़किया सबसे आगे रहती थी। और हम आज भी उतने ही खुबसूरत लगते है, बस लोगो का नजरिया बदल गया है। चलिए अपनी सुन्दरता के किस्से हम फ़िर कभी सुना देंगे। आइये वापस चलते है बचपन के उन हसीन लम्हों में। तो हमारे माता पिता दोनों ही नौकरी किया करते थे। इस वजह से हमें वो हमारे बहुत अजीज रिश्तेदारों के घर छोड़ दिया करते थे। हमारे लिए वो एक दुसरे घर जैसा हो गया था जहा हम दिन भर खेलते कूदते थे। वो सब भी हमारा बहुत ख्याल रखते थे और बहुत सारा वाला प्यार करते थे। हमारे साथ हँसते थे, खेलते थे और क्या नही करते थे।

फ़िर जब हम तीन साल के हुए तो हमारी भरती स्कूल में की गई और फ़िर हमारा उनके घर आना जाना कम हो गया। पर जहा दिल के तार जुड़ जाते है वहा की याद तो हमेशा ही आती है। तो बात उस दिन की है जब हमारे माता पिता हमारे लिए मिलिटरी की पोशाक लाये थे जिसे हम अपने विद्यालय की आकर्षक पहनावा प्रतियोगिता में प्रर्दशित करने वाले थे। उसे देख कर हम इतने उत्साहित थे की उसी समय हमने उसे पहनने की जिद की और फ़िर जब बात नही बनी तो अपना राम बाण उपयोग करने की सोची। जल्दी से हमने अपना रोने वाला चेहरा बनाया और उसपे मायूसी का तड़का लगाया। जादू चल गया। झट से हमने पोशाक पहन भी ली। 

माशा अल्लाह ! उस दिन तो हमने सेना में जाने की ठान ही ली थी। सभी ने
बहुत तारीफ़ की। फ़िर हमें याद आई हमारे दुसरे घर की। उन्हें ये रूप दिखाए बिना हमें चैन कहा आता। हमने अपने माता पिता से जिद की पर इस बार बात नही बनी। और इस बार कोई दाँव पेंच नही चले। हमारा दूसरा घर काफ़ी दूर था। पर हमें रास्ता याद था। तो हमने सोचा की हमें अकेले ही जाना चाहिए। तो बिना कुछ सोचे समझे हम निकल पड़े। तीन साल के थे हम और ऊपर से ये पोशाक। फ़िर भी उस समय हमें समझ नही आया था की लोग क्यूँ हमें इस तरह घुर घुर के देख रहे थे। काफी देर बाद जब हम अपने दुसरे घर पहुचे तो हमें देख वो सब उत्साहित होने की जगह चिंतित हो गए।

हमें घर पे न पाकर हमारे माता पिता तो डर ही गए थे। पुरे इलाके में हमारी खोज बीन चालू हो गई। फ़िर जब हमारे रिश्तेदारों ने हमें वापस घर लाया तब जाकर हमारे माता पिता की जान में जान आई। तब हमें लगता था की हमने ऐसा क्या कर दिया। आज उस बारे में सोचते है तो समझ आता है की उस नन्हे सिपाही ने क्या गुल खिलाये थे।

Tuesday, March 24, 2009

हमसफ़र

ऐ मेरे हमसफ़र, पास आजा ज़रा |
तेरे बिना दिल नही , लगता मेरा हमसफ़र ||
तन्हैया है बसी, अब हर एक मोड़ पर |
दिल ढूँढता है तुझे, आ जा मेरे हमसफ़र ||

तू ही तू बन गई , हर मंजिल हर डगर |
डूबा रहूँ यादो में, हर पल दिन रात भर ||
दीवाना फ़िर रहा, गलियों में रहो में |
अब आ जा तू मेरी, सुनी सी बाहों में ||

प्यार की इस कहानी में , एक मैं और एक तू |
हम दोनों जब मिले, एक दास्ताँ बन गई ||

तू ही है , तू ही है |
तू ही है जान मेरी ||
तू ही है दिल का चैन ||
तू ही है हमसफ़र ||