Wednesday, September 16, 2015

LBS Diaries Part 4 - जरूरतमंद

समय पवन की भाँति  तीव्र गति से भागा जा रहा है और हम कोर्स के दूसरे सप्ताह के अंत तक पहुंच चुके है। प्रत्येक  कक्षा में यह  देखा जा रहा है कि कुछ लोग जो अंग्रेजी नहीं बोल या समझ पाते है वो बड़ी ही दुविधा में है। यहाँ के सारे शिक्षक अंग्रेजी का ही प्रयोग करते है और इन लोगो के लिए एक या दो शब्द हिंदी के बोल देते है । परन्तु यह देख के एक बिडम्बना होती है की देश की जो  राज भाषा है उसको बोलने वालों को ही उन्ही के देश में मुसीबत होती है।  पता नहीं ये कहना कितना सही है और कितना गलत । एक तरफ हम बात करते है प्रांतीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने की और एक तरह हिंदी बोलने वालो को ही तकलीफ हो रही है ।

चलिए आशा करते है की इसका कुछ हल जल्दी ही निकले तबतक हम बात करते है एक महत्त्वपूर्ण विषय पर । कुछ ही दिन पहले हमारी अकादमी ने एक चिकित्सा शिविर का आयोजन किया था । इसमें हमारे साथ के प्रशिक्षु अधिकारी जो की चिकित्सक है उन्होंने मदद की । उन्होंने आस पास के क्षेत्रों में रह रहे गरीब लोगो का मुफ्त में उपचार किया और निशुल्क दवाइयाँ बाटी । इस दिन हमारे एक मित्र भी वहा मौजूद थे जिनका नाम है निखिल म व् । यह लेख लिखने की प्रेरणा मुझे उन्ही से मिली । 

तो बात ऐसी है की उनके पास एक मरीज आया जिसको पेट में दर्द की तकलीफ थी।  निखिल द्वारा जाँच करने के पश्चात कुछ गंभीर लक्षण नहीं पाए  गए । उस मरीज के साथ उसकी पत्नी और बेटी भी आई हुई थी और जो की बहुत ही चिंतित लग रही थी ।  निखिल ने जब उनको समझाने की कोशिश की और बताया की चिंता की कोई बात नहीं है क्यूंकि लक्षण सिर्फ मामूली पेट दर्द के ही है । उनका जवाब सुन कर निखिल हैरान था।  मरीज की पत्नी में बताया की उसके पति को पेट का कर्क रोग(Cancer ) है।  पहले कराये गए कुछ परीक्षणों में यह बात सामने आई थी और ये सिर्फ उसे और उसकी बेटी को पता थी।  दम्पति रोज काम कर मजदूरी कमाने वाले थे और इसके इलाज के लिए कही जा नहीं सकते थे।  पैसे का आभाव तो था ही और साथ ही बेटी का शिक्षण भी।  उनका सोचना यह था की इसका इलाज कराएंगे तो वो कर्ज के बोझ में दबते चले जायेंगे।  एक तरह से उन्होंने यह स्वीकार लिया था की वो अब बहुत दिनों का मेहमान नहीं है ।  

अब ऐसे में निखिल क्या करता।  उसने कुछ दवाइयाँ दी और कुछ कह न सका।  वहा कार्यरत लोगो ने बताया की ये परिवार हर सप्ताह यहाँ आता है क्यूंकि ये सुविधा निशुल्क है।  ऐसे कितने परिवार भारत में है इसकी कोई कल्पना भी  नहीं कर सकता।  एक तरफ  लोग लाखो रूपए बेफिजूल ही खर्च कर देते है और एक तरफ लाखों लोग चंद रुपयो के मोहताज है।  यह किस तरह का न्याय है ?

अंत में मैं सभी से यही विनती करता हु की इन जरूरतमंद लोगो के लिए आप अगर कुछ भी कर सकते है तो जरूर करे।  भगवान ने अगर हमे दुसरो से अधिक दिया है तो यह हमारा फ़र्ज़ है की हम दुसरो की  मदद करे।  और अधिकारियों से यह भी अपेक्षित है की वो ऐसे लोगो की  सहायता कर के दुसरो को प्रेरणा दे।  आशा करता हु की इस लेख से कुछ लोग प्रेरणा लेंगे और कुछ जरूरतमंद लोगो की सहायता करेंगे।

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